आखिर क्यों पुलिस की चालानी कार्रवाई ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्र के गरीब आदिवासी वाहन चालकों पर ही होती है ?


शाहिद जैनब

झाबुआ - जिले में इन दिनों पुलिस चौराहों पर चालान बनाते हुए दिखाई दे रही है। ज्यादातर पुलिस चालान दो पहिया वाहनों के बनाए जाते है,वो भी गरीब और ग्रामीण क्षेत्र के दो पहिया वाहनो के बनाए जाते है । अब सवाल उठता है कि क्या सिर्फ़ पुलिस को ग्रामीण क्षेत्रों के दो पहिया वाहनों के चालान का आदेश मिलता है? लगता है पुलिस अपना चलानी कोटा ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले वाहनो से पूरा कर लेती है । क्या यातायात नियमों का उलंघन सिर्फ़ ग्रामीण क्षेत्रों के लोग ही कर रहे हैं शहरी क्षेत्रों के दो पहिया वाहन चालक यातायात नियमों का उलंघन नही कर रहे ? क्या जिले में चलने वाली बसे यातायात नियमों का उलंघन नही कर रही ? जिले में चलने वाली कई बसों की टेल लाइट (पीछे की ब्रेक लाइट) बंद नही रहती । कई बसों के चालक नशा कर कर बस चला रहे हैं लेकिन कभी भी पुलिस बसों पर नेताओ के वाहनों पर,और सेठों के वाहनों पर कोई कारवाही नही करती । हां अगर ग्रामीण क्षेत्र के दो पहिया वाहन चालक यातायात नियमों का उल्लंघन करते हैं तो उन पर भी कार्रवाई की जाए लेकिन सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों पर ही पुलिस क्यों कार्रवाई करती है यह समझ से परे नजर आता है ?  
जिले से रोजगार की तलाश में गुजरात की ओर पलायन करने वाले कई ग्रामीणों को गुजरात जाने वाली बसों में ठूस ठूस कर ले जाया जाता है। एक बस में 70 से 80 सवारी भरी जाती हैं  लेकिन पुलिस प्रशासन किसी भी प्रकार से इन अवर लोड चलने वाली बसों पर कोई कार्यवाही नहीं करती। पुलिस की ओर से चालानी कार्रवाई की जाती है तो सिर्फ उन वाहन चालकों पर की जाती है जिनका नेताओं और रसूखदार लोगों से संपर्क नहीं होता है गरीबों और ग्रामीणों पर चालानी कार्रवाई कर पुलिस अपने चालानी कोटे को पूरा करती हुई दिखाई देती है । 
जिले की कई बस चालक एसे भी है जो रोज सुबह नशा करने के बाद ही बस चला रहे हैं नशाखोर बस चालक को की वजह से कभी भी बड़ी सड़क दुर्घटना हो सकती हैं, लेकिन जिले की यातायात पुलिस तो सिर्फ़ ग्रामीण क्षेत्रों के वाहन चालकों के चालान काटेने में मस्त दिखाई देती हैं । 

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